लखनऊ। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण के विरोध में प्रदेशभर में जारी आंदोलन को लेकर सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। समिति का कहना है कि नवंबर 2024 में लिया गया एकतरफा निजीकरण का निर्णय ऊर्जा निगमों के कार्य वातावरण को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है।

निजीकरण के फैसले के बाद बिजली कर्मचारियों में भारी असंतोष

संघर्ष समिति के अनुसार निजीकरण के फैसले के बाद बिजली कर्मचारियों में भारी असंतोष है, जिसके चलते वे आंदोलन के लिए मजबूर हुए हैं। समिति के केंद्रीय पदाधिकारियों ने बताया कि बिजली कर्मी पिछले 437 दिनों से आंदोलनरत हैं, इसके बावजूद उपभोक्ताओं की समस्याओं के समाधान को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है और विद्युत आपूर्ति बनाए रखी जा रही है।

दमनात्मक व उत्पीड़नात्मक कार्रवाई की जा रही

संघर्ष समिति ने आरोप लगाया कि पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन द्वारा नियमित कर्मचारियों, संविदा कर्मियों, जूनियर इंजीनियरों और अभियंताओं के खिलाफ दमनात्मक व उत्पीड़नात्मक कार्रवाई की जा रही है। इससे ऊर्जा निगमों में तनावपूर्ण माहौल बन गया है और विकास कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं। समिति ने इस स्थिति को “अघोषित आपातकाल जैसी” करार दिया है।

अब तक जो सुधार हुए हैं, वे आगे भी जारी रहेंगे

संघर्ष समिति ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा है कि आंदोलन के नाम पर कर्मचारियों के खिलाफ की गई सभी दमनात्मक और अनुशासनात्मक कार्यवाहियों को तत्काल वापस कराया जाए। समिति ने भरोसा जताया कि मुख्यमंत्री के नेतृत्व में प्रदेश की बिजली व्यवस्था में अब तक जो सुधार हुए हैं, वे आगे भी जारी रहेंगे।

आंदोलन के बावजूद उपभोक्ता सेवाओं को प्राथमिकता दें

इसके साथ ही संघर्ष समिति ने प्रदेश के सभी बिजली कर्मियों से अपील की है कि निजीकरण विरोधी आंदोलन के बावजूद उपभोक्ता सेवाओं को प्राथमिकता दें और सरकार की बिजली बिल राहत योजना के प्रभावी क्रियान्वयन में पूरा सहयोग करें।निजीकरण के विरोध में चल रहे आंदोलन के 437वें दिन शनिवार को प्रदेश के सभी जनपदों में बिजली कर्मियों ने व्यापक विरोध प्रदर्शन किया।

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