लखनऊ । उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी मोड़ आया है। बसपा सरकार में ‘मिनी मुख्यमंत्री’ के तौर पर पहचान बना चुके नसीमुद्दीन सिद्दीकी का समाजवादी पार्टी में शामिल होना सिर्फ दल बदल नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की राजनीति में नई बिसात बिछने का संकेत माना जा रहा है।
बसपा से सपा तक: सियासी सफर का नया अध्याय
1991 में बांदा सदर सीट से बसपा विधायक बने नसीमुद्दीन ने मायावती सरकार में कई अहम विभाग संभाले। सत्ता के गलियारों में उनका कद इतना बड़ा था कि उन्हें ‘मिनी मुख्यमंत्री’ कहा जाने लगा। लेकिन बसपा से अलगाव और बाद के राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बाद अब उन्होंने सपा का दामन थाम लिया है।
मुस्लिम और बहुजन वोट बैंक को साधने की कोशिश
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की मौजूदगी में हुई इस ज्वाइनिंग को महज औपचारिकता नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे 2027 के विधानसभा चुनाव की रणनीतिक तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है। अखिलेश का यह बयान—“उन्होंने सिर्फ मकान बदला है, मोहल्ला नहीं”—सीधे तौर पर मुस्लिम और बहुजन वोट बैंक को साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
पुराने बसपाइयों का ‘री-यूनियन’
नसीमुद्दीन को सपा में कई पुराने बसपाई साथी मिलेंगे। विशंभर प्रसाद निषाद, जो कभी उनके करीबी रहे, अब सपा के राष्ट्रीय महासचिव हैं। वहीं बाबू सिंह कुशवाहा भी अब सपा के सांसद हैं। हालांकि इन नेताओं के बीच कभी सियासी खटास भी रही, लेकिन सपा का मंच उन्हें एक बार फिर साथ खड़ा कर सकता है।यह समीकरण बुंदेलखंड में ओबीसी–मुस्लिम–दलित गठजोड़ की नई संभावनाएं खोल सकता है।
बांदा और बुंदेलखंड में बदलेगा गणित?
बांदा ऐतिहासिक रूप से राजनीतिक रूप से संवेदनशील जिला रहा है। यहां जातीय और सामुदायिक समीकरण चुनावी परिणाम तय करते हैं। नसीमुद्दीन की मुस्लिम समाज में मजबूत पकड़ मानी जाती है। यदि उनका प्रभाव जमीनी स्तर पर सक्रिय हुआ तो सपा को सीधा लाभ मिल सकता है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम बसपा के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगा सकता है। वहीं भाजपा को भी अपने सामाजिक समीकरणों को और सशक्त करना होगा।
सपा को मिलेगा अनुभव और नेटवर्क
नसीमुद्दीन सिद्दीकी का लंबा प्रशासनिक और राजनीतिक अनुभव सपा संगठन के लिए उपयोगी साबित हो सकता है। उन्होंने दावा किया कि 15,718 लोग विभिन्न दलों को छोड़कर सपा में शामिल हुए हैं। यह संख्या चाहे प्रतीकात्मक हो, लेकिन संदेश स्पष्ट है—सपा 2027 के लिए बड़े स्तर पर सामाजिक विस्तार चाहती है।इस ज्वाइनिंग समारोह में अनीस अहमद उर्फ फूल बाबू, दीनानाथ कुशवाहा, राजकुमार पाल, डॉ. दानिश खान, हुस्ना सिद्दीकी और रंजना पाल जैसे नेताओं की मौजूदगी ने कार्यक्रम को शक्ति प्रदर्शन में बदल दिया।
विपक्ष के लिए चेतावनी
नसीमुद्दीन की एंट्री से बसपा के लिए खासकर बुंदेलखंड में चुनौती बढ़ सकती है। मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण की स्थिति में सपा को मजबूती मिल सकती है। वहीं भाजपा को अपने कोर वोट बैंक के साथ-साथ नए सामाजिक समीकरण साधने होंगे।स्पष्ट है कि यह सिर्फ एक नेता की ज्वाइनिंग नहीं, बल्कि 2027 की लड़ाई से पहले सियासी शतरंज की बड़ी चाल है। आने वाले महीनों में यह तय होगा कि यह कदम सपा के लिए मास्टरस्ट्रोक साबित होता है या सिर्फ प्रतीकात्मक सियासत बनकर रह जाता है।
