एसएमयूपीन्यूज, लखनऊ । पुलिस कमिश्नरेट लखनऊ में साइबर फ्रॉड का शिकार हुए पीड़ितों को तत्काल सहायता दिलाने और साइबर अपराधियों पर प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने के उद्देश्य से “Specialized Training” शाखा द्वारा सोमवार 02 फरवरी 2026 को एक विशेष प्रशिक्षण कार्यशाला आयोजित की गई। यह कार्यशाला रिजर्व पुलिस लाइन्स स्थित संगोष्ठी सदन में आयोजित हुई, जिसका मुख्य विषय “साइबर फ्रॉड पीड़ितों के लिए फर्स्ट रेस्पॉन्डर के रूप में साइबर हेल्प डेस्क के कर्त्तव्य” रहा।
कुशल पर्यवेक्षण में प्रशिक्षण सत्र संपन्न कराया गया
यह प्रशिक्षण उत्तर प्रदेश शासन की मंशा के अनुरूप पुलिस आयुक्त लखनऊ अमरेन्द्र कुमार सेंगर के आदेश के क्रम में आयोजित किया गया। कार्यक्रम को संयुक्त पुलिस आयुक्त (अपराध एवं मुख्यालय) अपर्णा कुमार एवं संयुक्त पुलिस आयुक्त (कानून एवं व्यवस्था) बबलू कुमार के प्रभावी मार्गदर्शन में संपन्न कराया गया।कार्यशाला का आयोजन पुलिस उपायुक्त अपराध कमलेश कुमार दीक्षित तथा पुलिस उपायुक्त मुख्यालय अनिल कुमार यादव के निर्देशन में हुआ। वहीं, अपर पुलिस उपायुक्त अपराध किरन यादव के नेतृत्व और सहायक पुलिस आयुक्त (महिला अपराध/साइबर क्राइम) सौम्या पाण्डेय के कुशल पर्यवेक्षण में प्रशिक्षण सत्र संपन्न कराया गया।
170 पुलिसकर्मियों को मिली स्पेशल ट्रेनिंग
कार्यशाला में साइबर एक्सपर्ट अनुज अग्रवाल ने प्रतिभागियों को साइबर अपराध की रोकथाम, त्वरित साक्ष्य संकलन, पीड़ितों को तुरंत सहायता पहुंचाने और तकनीकी जांच की आधुनिक विधियों पर विस्तृत प्रशिक्षण दिया। इस दौरान विभिन्न थानों के साइबर हेल्प डेस्क प्रभारी, आरक्षी, तथा पिंक बूथ पर नियुक्त महिला आरक्षियों सहित लगभग 170 पुलिसकर्मियों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया।कार्यशाला में 1930 साइबर हेल्पलाइन और NCRP पोर्टल की बारीकियों से अवगत कराया गया। साथ ही डिजिटल अरेस्ट, लोन ऐप फ्रॉड, इन्वेस्टमेंट फ्रॉड जैसे मामलों में अपराधियों के modus operandi और त्वरित कार्रवाई के तरीके बताए गए।
डेटा प्राप्त करने की विधिक प्रक्रिया पर भी विस्तृत जानकारी दी गई
विशेषज्ञों ने UTR/Transaction ID की भूमिका पर विशेष जोर देते हुए बताया कि वित्तीय धोखाधड़ी मामलों में यह अपराधियों तक पहुंचने की पहली और सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।इसके अलावा साइबर जांच में IP Address और IPDR (Internet Protocol Detail Record) एनालिसिस के महत्व पर प्रशिक्षण दिया गया। डिजिटल साक्ष्यों की सुरक्षा के लिए फेराडे बैग (Faraday Bag) के उपयोग तथा फोरेंसिक इमेजिंग की वैज्ञानिक प्रक्रिया भी सिखाई गई, जिससे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों में किसी प्रकार की छेड़छाड़ न हो।कार्यशाला में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से संदिग्धों का डेटा प्राप्त करने की विधिक प्रक्रिया पर भी विस्तृत जानकारी दी गई।
इस पहल से पुलिस बल की पेशेवर क्षमता बढ़ेगी
प्रतिभागियों को I4C की मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) और मेटा (फेसबुक, इंस्टाग्राम), ट्विटर, यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स से सूचना/डेटा लेने की कानूनी प्रक्रिया समझाई गई।कार्यशाला के निष्कर्ष में यह स्पष्ट हुआ कि साइबर अपराधों के मामलों में तकनीकी रूप से दक्ष ‘फर्स्ट रेस्पॉन्डर’ ही पीड़ितों को समय रहते राहत दिलाने, वित्तीय क्षति रोकने और अपराधियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस पहल से पुलिस बल की पेशेवर क्षमता बढ़ेगी और साइबर अपराधों की जांच में साक्ष्य संकलन की प्रक्रिया और अधिक प्रभावी बनेगी।
