लखनऊ। राजधानी के आशियाना सेक्टर-एल की वह सुबह किसी और दिन जैसी ही थी। लेकिन 20 फरवरी की भोर ने एक परिवार की दुनिया हमेशा के लिए बदल दी। घर की तीसरी मंजिल पर रहने वाले 49 वर्षीय मानवेंद्र सिंह—जो पेशे से शराब कारोबारी और पैथोलॉजी संचालक थे—को शायद अंदाज़ा भी नहीं था कि जिस बेटे के भविष्य के लिए वे हर रोज़ चिंतित रहते थे, वही उनकी आखिरी सांसों का गवाह बनेगा।
मानवेंद्र ने पत्नी के गुजर जाने के बाद दूसरी शादी नहीं की
मानवेंद्र ने पत्नी के गुजर जाने के बाद दूसरी शादी नहीं की। उनका कहना था—“बच्चों की परवरिश में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।” वे बेटी कृति और बेटे अक्षत के साथ उसी कमरे में सोते थे, ताकि बच्चों को कभी अकेलापन न लगे। बेटी कृति से उनका खास लगाव था। कॉलोनी के लोग कहते हैं—“वो अपनी बेटी पर जान छिड़कते थे।”
पिता-पुत्र के बीच पढ़ाई को लेकर कहासुनी हुई
लेकिन 20 फरवरी की सुबह करीब साढ़े चार बजे पिता-पुत्र के बीच पढ़ाई को लेकर कहासुनी हुई। नीट परीक्षा की तैयारी का दबाव… सपनों का बोझ… और एक पल का गुस्सा। आरोप है कि इसी गुस्से में अक्षत ने लाइसेंसी राइफल से पिता को गोली मार दी। घर की दीवारों ने एक चीख सुनी… और फिर सब खामोश हो गया।
खौफ का सन्नाटा
कमरे में मौजूद कक्षा 11 की छात्रा कृति ने अपने पिता को गिरते देखा। लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने उसे भीतर से पत्थर बना दिया। भाई ने धमकी दी—“अगर किसी को बताया, तो तुम्हें भी मार दूंगा।” डर की जंजीरों में जकड़ी कृति अगले ही दिन परीक्षा देने स्कूल गई। उसने पेपर दिया, सहेलियों से मुस्कुराकर मिली… लेकिन दिल के भीतर एक तूफान दबाए रही।घर लौटकर उसने वही किया जो उसे कहा गया—चुप रहना।
हैरत में डालने वाला व्यवहार
उधर, पिता की हत्या के बाद भी अक्षत का चेहरा भावशून्य रहा। वह बाजार से पनीर और मिठाई खरीदकर लाया। चाची को पनीर देकर बोला—“खाना बना दीजिए।” फिर पूरे परिवार के साथ बैठकर सामान्य तरीके से भोजन किया। मिठाई भी खिलाई—मानो घर में कुछ हुआ ही न हो।लेकिन सच ज्यादा दिन छिप नहीं सका।
जब खुला राज
गुमशुदगी की शिकायत के बाद पुलिस ने पूछताछ की तो परत-दर-परत सच्चाई सामने आई। आरोप है कि अक्षत ने शव के टुकड़े कर साक्ष्य मिटाने की कोशिश की। हाथ-पैर अलग फेंक दिए, धड़ को ड्रम में छिपा दिया। लेकिन वह अपने अपराध को पूरी तरह छिपा नहीं सका।
अंतिम विदाई… बिना बेटे के
छठे दिन जब वीआईपी रोड स्थित बैकुंठ धाम में मानवेंद्र सिंह का अंतिम संस्कार हुआ, तो मुखाग्नि बेटे ने नहीं, भतीजे ने दी। मां बार-बार बेहोश हो रही थीं। कॉलोनी के लोग रो रहे थे—सिर्फ एक मौत पर नहीं, बल्कि टूटे हुए भरोसे पर।
जेल की सलाखों के पीछे
अक्षत अब जेल में है। बताया जा रहा है कि वह बार-बार कह रहा है—“पापा ने मुझे मारा, तो मैंने उन्हें मार दिया…” उसकी मानसिक स्थिति की जांच हो रही है, काउंसिलिंग जारी है।यह सिर्फ एक हत्या की कहानी नहीं है। यह उस पिता की कहानी है, जिसने अपने बच्चों के लिए खुद को समर्पित कर दिया। यह उस बेटी की कहानी है, जिसने खौफ में अपने आंसू पी लिए। और यह उस एक पल के गुस्से की कहानी है, जिसने एक परिवार की जड़ें उखाड़ दीं।लखनऊ का वह घर अब भी खड़ा है… लेकिन उसके आंगन में अब सन्नाटा बसता है।
