प्रयागराज। मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एमएनएनआईटी), प्रयागराज के सेमिनार हॉल में गुरुवार, 23 जनवरी 2026 को स्टूडेंट एक्टिविटी सेंटर द्वारा आयोजित कार्यक्रम “इकोलॉजी इन्क्लूसिव इकोनॉमी” में पद्म विभूषण से सम्मानित प्रसिद्ध पर्यावरणविद् डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने मुख्य वक्ता के रूप में पर्यावरण विनाश को लेकर गंभीर चेतावनी दी।

समाज को प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाया जा सके

बसंत पंचमी के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. जोशी ने कहा कि मानवता आज अपनी जीवनदायी पारिस्थितिकी (इकोलॉजी) का सौदा क्षणभंगुर और उपभोक्तावादी अर्थव्यवस्था के साथ कर रही है। उन्होंने कहा कि पिछले कई वर्षों से बसंत पंचमी को “प्रकृति नमन दिवस” के रूप में मनाया जा रहा है, ताकि समाज को प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाया जा सके।

आधुनिक जीवनशैली और डिजिटल एडिक्शन पर तीखा कटाक्ष

खचाखच भरे सभागार में छात्रों और शिक्षकों को संबोधित करते हुए डॉ. जोशी ने आधुनिक जीवनशैली और डिजिटल एडिक्शन पर तीखा कटाक्ष किया। उन्होंने कहा,“हमने प्राकृतिक बुद्धिमत्ता (Natural Intelligence) को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से बदल दिया है। आज अगर किसी का मोबाइल एक दिन के लिए छीन लिया जाए, तो उसकी सांसें फूलने लगती हैं। यह हमारी प्रकृति से कटती हुई जड़ों का प्रमाण है।”

वनों की कटाई और शारीरिक गिरावट की नींव रखी

मानव सभ्यता के विकास क्रम पर सवाल उठाते हुए उन्होंने इसे एक प्रकार का पारिस्थितिक धोखा बताया। उन्होंने कहा कि शिकार-संग्रहण से कृषि की ओर संक्रमण ने बड़े पैमाने पर वनों की कटाई और शारीरिक गिरावट की नींव रखी। डॉ. जोशी ने आधुनिक प्रगति की विडंबना पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जहां होमो सेपियन्स की आबादी आठ अरब से अधिक हो चुकी है, वहीं जिराफ और भेड़िये जैसे वन्यजीव विलुप्ति की कगार पर हैं।

पांच ट्रिलियन टुकड़ों की ओर भी बढ़ रहे

प्रकृति के व्यवसायीकरण पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि पानी, जो कभी प्रकृति का मुफ्त उपहार था, आज प्लास्टिक की बोतलों में बंद होकर विलासिता की वस्तु बन गया है। उन्होंने चेताया,“हम $5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था की ओर भाग रहे हैं, लेकिन साथ ही महासागरों में प्लास्टिक के पांच ट्रिलियन टुकड़ों की ओर भी बढ़ रहे हैं।”

ऊंचे ‘पैकेज’ तक सीमित न रहने का आह्वान किया

डॉ. जोशी ने शैक्षणिक समुदाय से केवल डिग्री और ऊंचे ‘पैकेज’ तक सीमित न रहने का आह्वान किया। उन्होंने समावेशी पारिस्थितिकी पर जोर देते हुए कहा कि प्रगति का वास्तविक पैमाना उपभोग नहीं, बल्कि हमारी नदियों, मिट्टी और पर्यावरण का स्वस्थ होना होना चाहिए।कार्यक्रम में प्रकृति नमन दिवस के महत्व पर विस्तार से पर्यावरणविद् रामबाबू तिवारी ने प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह दिवस 2023 से बसंत पंचमी के दिन मनाया जा रहा है।

2023 में 5 प्रदेशों के 190 स्थानों पर

2024 में 7 प्रदेशों के 214 स्थानों पर

2025 में 10 प्रदेशों के 278 स्थानों पर

और 2026 में 291 स्थानों पर

प्रकृति नमन दिवस मनाया जा रहा है।

यह पर्व केवल ऋतु परिवर्तन का उत्सव नहीं

उन्होंने कहा कि बसंत पंचमी का पर्यावरणीय महत्व भारतीय संस्कृति में प्रकृति और मानव के गहरे संबंध को दर्शाता है। यह पर्व केवल ऋतु परिवर्तन का उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति के पुनर्जागरण, जैव विविधता और संतुलन का प्रतीक है।कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. वी.के. श्रीवास्तव, ऑफिशिएटिंग निदेशक, एमएनएनआईटी प्रयागराज ने की, जबकि संचालन डॉ. समीर श्रीवास्तव ने किया।कार्यक्रम में प्रमुख रूप से प्रो. रवि प्रकाश तिवारी, प्रो. मनीषा सचान, प्रो. दीपेश पटेल, प्रो. लक्ष्मीकांत मिश्रा, डॉ. श्रवण मिश्रा, अमित तिवारी, डॉ. शैलेन्द्र मिश्रा सहित सैकड़ों छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

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