एसएमयूपीन्यूज, लखनऊ । उत्तर प्रदेश की राजधानी से महज 38 किलोमीटर दूर बाराबंकी जिले का छोटा-सा गांव गड़रियन पुरवा। दूरी भले कम हो, लेकिन अंधेरे से उजाले तक का सफर इस गांव ने पूरे 78 साल में तय किया। जर्जर सड़कों से होकर जहां पहुंचने में आज भी करीब सवा घंटे लगते हैं, वहीं बिजली की रोशनी गांव तक पहुंचने में पीढ़ियां गुजर गईं।
83 वर्षीय रामनरेश यादव की आंखों में अब सुकून
गांव के सबसे बुजुर्ग 83 वर्षीय रामनरेश यादव की आंखों में अब सुकून है। वे भावुक होकर बताते हैं—“लरिकाई में लखनऊ गए रहेन… ऊहां बिजली से जगमग शहर देखिन… तभी सपना देखे रहेन कि एक दिन हमरे गांव में भी उजाला आई… अब 20 जनवरी को ऊ सपना पूरा भवा।”
पहली बार जले बल्ब, बच्चों ने देखा कार्टून
20 जनवरी को जैसे ही गांव में बिजली आई, माहौल बदल गया। बच्चों ने पहली बार टीवी पर कार्टून देखा। महिलाओं ने गांव के बाहर लगे दो ट्रांसफॉर्मरों पर टीका लगाया, पूजा की। वर्षों से अंधेरे में डूबे घरों में बल्ब जलते ही मानो गांव में उत्सव छा गया।सौभाग्य योजना फेज-3 के तहत गांव में पोल लगे, तार खिंचे और बिजली आपूर्ति शुरू हुई। गांव के शिवराज को पहला कनेक्शन मिला। करीब 570 की आबादी वाले इस गांव में यादव और पाल समाज के परिवार रहते हैं, जिनकी आजीविका खेती और पशुपालन पर निर्भर है।
शादी से पढ़ाई तक, हर जगह अंधेरे की मार
बिजली न होने का असर सिर्फ सुविधाओं तक सीमित नहीं था।ग्रामीण बताते हैं कि बेटों की शादी में दिक्कत होती थी। रिश्तेदार गांव आने से कतराते थे। रात होते ही पूरा गांव घुप अंधेरे में डूब जाता था। गर्मी और बरसात में हालात और बदतर हो जाते थे।रोहित पाल बताते हैं, “करीब 10 संपन्न परिवारों ने मजबूरी में जनरेटर खरीदे, लेकिन आसपास के गांवों की रोशनी देखकर अपने पिछड़ेपन का दर्द हर रोज सालता था।”
2010 से शुरू हुई लड़ाई, 2026 में मिली मंज़िल
ग्रामीणों ने 2010 से बिजली के लिए दौड़-भाग शुरू की। सांसद, विधायक, डीएम से लेकर सीएम कार्यालय तक गुहार लगाई गई।2017 में कहीं जाकर पोल लगने शुरू हुए, लेकिन वन विभाग ने जमीन को अपनी बताते हुए एनओसी देने से इनकार कर दिया। यहीं पर काम अटक गया और सालों तक गांव अंधेरे में रहा।अब जाकर ट्रांसफॉर्मर लगाकर सप्लाई शुरू हुई है। फिलहाल केवल दो कनेक्शन जारी हुए हैं, जबकि 40 आवेदन अब भी लंबित हैं। ग्रामीणों को उम्मीद है कि जल्द सभी घरों में मीटर लगेंगे और गांव पूरी तरह रोशनी से नहा उठेगा।
सोलर बना सहारा, अब मिली असली आज़ादी
बिजली न होने के दौरान गांव के 90 घरों में से 65 घरों ने सोलर सिस्टम का सहारा लिया।पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना और नवीकरणीय ऊर्जा विभाग की मदद से रोशनी तो मिली, लेकिन टीवी, वॉशिंग मशीन, टुल्लू पंप जैसे उपकरण चलाना संभव नहीं था।रोहित पाल कहते हैं “ढिबरी के उजाले में बच्चों की पढ़ाई मुश्किल थी। अब ढिबरी युग से छुटकारा मिल गया है।”विपिन कुमार बताते हैं“गर्मी में बगीचे में रात काटनी पड़ती थी। अब कूलर, फ्रिज का आनंद ले सकेंगे। हम भी विकास के उजाले में कदमताल करेंगे।”
बिजली विभाग का दावा
अधिशासी अभियंता घनश्याम त्रिपाठी का कहना है—“गांव में विद्युतीकरण पूरा हो चुका है। बिजली आपूर्ति शुरू है और शेष ग्रामीणों को भी जल्द कनेक्शन जारी किए जाएंगे।”गड़रियन पुरवा की कहानी सिर्फ बिजली आने की नहीं, बल्कि सिस्टम से जूझते गांव की उम्मीद, धैर्य और अंततः जीत की कहानी है—जहां 78 साल बाद अंधेरे पर उजाले ने जीत दर्ज की है।
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