एसएमयूपीन्यूज, लखनऊ । पूर्वांचल में इस बार दीपावली की रोशनी कई घरों के लिए ज़िंदगी भर का अंधेरा बन गई। यूट्यूब से सीखी गई एक खतरनाक “कार्बाइड गन” ने ऐसा कहर बरपाया कि 65 बच्चों और युवाओं की आंखों की रोशनी चली गई। अब इन मासूमों के लिए सामान्य इलाज नहीं, बल्कि आंखों की सर्जरी और नेत्र प्रत्यारोपण ही आख़िरी विकल्प बचा है।

पाइप से बनी कार्बाइड गन से पटाखे चला रहे थे

यह सनसनीखेज मामला तब सामने आया जब दीपावली के बाद एक के बाद एक आंखों से गंभीर रूप से घायल बच्चे बीएचयू और वाराणसी के अन्य अस्पतालों में पहुंचने लगे। जांच में सामने आया कि ये सभी बच्चे प्लास्टिक के पाइप से बनी कार्बाइड गन से पटाखे चला रहे थे, जिसे सोशल मीडिया पर देखकर महज 300 रुपये में घर पर ही तैयार किया गया था।

काली पुतली चिपकी, बुझ गई रोशनी

डॉक्टरों के मुताबिक कार्बाइड के तेज रासायनिक कण आंख में जाने से बच्चों की आंखों की काली पुतली आपस में चिपक गई। इससे आंखों की पारदर्शी झिल्ली पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई और रोशनी चली गई। कई बच्चों की हालत इतनी गंभीर है कि रोशनी लौटने की संभावना बेहद कम बताई जा रही है।इन पीड़ितों में 30 से ज्यादा बच्चे 5 से 14 साल की उम्र के हैं,जबकि 18 से 23 साल के 10 युवाओं की आंखों की रोशनी भी जा चुकी है।

दिवाली से पहले शुरू हुआ मौत का खेल

बीएचयू के क्षेत्रीय नेत्र संस्थान के विभागाध्यक्ष प्रो. आरपी मौर्य के अनुसार, दीपावली से एक सप्ताह पहले और उसके 15 दिन बाद तक ऐसे मामले लगातार सामने आते रहे। पिछले डेढ़ महीने में सिर्फ बीएचयू में ही करीब 40 बच्चों और युवाओं का इलाज किया गया, जिनमें से 22 सीधे कार्बाइड गन से घायल थे।डराने वाली बात यह है कि 80 फीसदी घायल खुद गन चला रहे थे,जबकि 20 फीसदी सिर्फ तमाशबीन थे, जो पास खड़े होकर देख रहे थे।

छोटे कस्बों में खुलेआम बिकती रही ‘मौत की गन’

वाराणसी, आजमगढ़, गाजीपुर, मऊ, बलिया, जौनपुर समेत पूर्वांचल के कई जिलों में दीपावली पर इस खतरनाक गन का खुलेआम इस्तेमाल हुआ। जहां बाजार में पटाखे चलाने वाली बंदूकें 500 रुपये या उससे ज्यादा में मिलती हैं, वहीं बच्चों ने सोशल मीडिया से तरीका देखकर सस्ती और जानलेवा कार्बाइड गन खुद बना ली। कुछ छोटे कस्बों में ठेले और दुकानों पर भी इसे चोरी-छिपे बेचा गया।

सर्जरी भी दे रही है सीमित उम्मीद

नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. अनुराग टंडन अब तक तीन मासूम बच्चों की सर्जरी कर चुके हैं एक 6 साल का,दूसरा 8 साल का और तीसरा 10 साल का बच्चा।डॉ. टंडन के मुताबिक आंख में कार्बाइड जाने से काली पुतली पूरी तरह खराब हो जाती है। ऐसी स्थिति में आंखों की रोशनी वापस आना बेहद दुर्लभ होता है और कई मामलों में नेत्र प्रत्यारोपण ही एकमात्र रास्ता बचता है।

कहां कितने बच्चों का इलाज

बीएचयू – 40,डॉ. अनुराग टंडन – 5,डॉ. आर.के. ओझा – 10, डॉ. सुनील शाह – 10 (इसके अलावा कई बच्चे निजी अस्पतालों में भी इलाज करा रहे हैं)

देशभर में गूंजा मामला, बीएचयू ने किया शोध

इस गंभीर खतरे को देखते हुए बीएचयू ने पूरे मामले पर शोध कराया है, जिसे गुवाहाटी में आयोजित अखिल भारतीय नेत्र चोट संस्थान के वार्षिक सम्मेलन में प्रस्तुत किया जाएगा। वहीं इंडियन ऑप्थल्मोलॉजिकल सोसाइटी ने देशभर के 20 विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम बनाकर कार्बाइड गन से होने वाली आंखों की चोट पर अध्ययन शुरू कर दिया है।

सवाल बड़ा है

यह हादसा सिर्फ एक त्योहार की लापरवाही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के खतरनाक ट्रेंड, लचर निगरानी और अभिभावकों की अनदेखी का नतीजा है। अब सवाल यह है क्या अगली दिवाली से पहले इस ‘अंधी खुशी’ पर लगाम लगेगी, या फिर और मासूम अपनी रोशनी खोते रहेंगे?

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