एसएमयूपीन्यूज, लखनऊ । उत्तर प्रदेश के बिजली उपभोक्ताओं के लिए दिसंबर महीना महंगा साबित होने जा रहा है। राज्य की बिजली कंपनियों ने इस माह के बिल में 5.56% अतिरिक्त ईंधन अधिभार (एफएसी) जोड़ने का फैसला किया है। यह रकम सितंबर महीने के लिए देय ईंधन लागत समायोजन (Fuel Adjustment Charge) के रूप में वसूली जाएगी। इस बढ़ोतरी से प्रदेश भर के उपभोक्ताओं की जेब से करीब 264 करोड़ रुपये अतिरिक्त निकलेंगे।

बिजली कंपनियों पर 51,000 करोड़ बकाया, फिर भी बढ़ी वसूली

राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने इस अतिरिक्त वसूली पर नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि बिजली कंपनियों पर ही उपभोक्ताओं का 51 हजार करोड़ रुपये का भारी बकाया है। इसके बावजूद उपभोक्ताओं पर बार-बार ईंधन अधिभार के नाम पर बोझ डालना उचित नहीं है।

उपभोक्ताओं को राहत देने के मामले में पीछ हट जाती हैं कंपनियां

वर्मा का कहना है कि कंपनियों को पहले उपभोक्ताओं के बकाए का निस्तारण करना चाहिए, न कि हर कुछ महीनों में अतिरिक्त शुल्क थोपकर आम जनता पर वित्तीय दबाव बढ़ाया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि उपभोक्ता हितों की बात तब उठाई जाती है जब बिजली कंपनियों को राहत दी जानी हो, लेकिन उपभोक्ताओं को राहत देने के मामले में कंपनियां पीछे हट जाती हैं।

डिमांड बेस्ड टैरिफ भी बना सिरदर्द

राज्य में लागू डिमांड बेस्ड टैरिफ प्रणाली पर भी सवाल उठाए गए हैं। वर्मा ने स्पष्ट कहा कि जब यह टैरिफ लागू किया गया था, तब दावा किया गया था कि इससे उपभोक्ताओं को लाभ होगा। लेकिन व्यवहार में देखा गया कि इस प्रणाली ने उपभोक्ताओं के बिलों में और वृद्धि कर दी है।उन्होंने बताया कि कई उपभोक्ताओं को उनकी वास्तविक खपत से अधिक की डिमांड चार्ज देनी पड़ रही है, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।

UPERC से पुनर्विचार की तैयारी

राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने घोषणा की है कि जल्द ही इस मुद्दे पर उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग (UPERC) से पुनर्विचार की मांग की जाएगी। परिषद की माँग है कि ईंधन अधिभार वसूली पर रोक लगाई जाए,डिमांड बेस्ड टैरिफ की समीक्षा की जाए,उपभोक्ताओं पर अनावश्यक वित्तीय बोझ कम किया जाए।उपभोक्ता संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि कंपनियां वसूली के निर्णय पर अड़ी रहती हैं, तो प्रदेशभर में विरोध भी तेज हो सकता है।

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