एसएमयूपीन्यूज, लखनऊ । राजधानी के गुडंबा क्षेत्र का बेहटा गांव एक बार फिर खौफनाक धमाकों से दहल उठा। सुबह आलम के घर में पटाखों से विस्फोट हुआ और शाम को आलम के ही भतीजे शेरू के गोदाम में बारूद फटा। सात घंटे के अंदर दो बड़े धमाकों ने पुलिस-प्रशासन की लापरवाही को खुलकर सामने ला दिया। सवाल यही उठ रहा है कि जब गांव में सालों से पटाखे बनाए और जमा किए जा रहे थे तो आखिर पुलिस को भनक क्यों नहीं लगी?

पुलिस की नाकामी या फिर मिलीभगत?

बेहटा गांव कोई जंगल या सुनसान इलाका नहीं है। रिहायशी घरों के बीच खुलेआम पटाखे बनाए जा रहे थे, दर्जनों घरों में यह धंधा चलता रहा। ग्रामीणों ने बार-बार शिकायत की, लेकिन न थाने की पुलिस जागी, न खुफिया विभाग। धमाके में दो लोग मारे गए, कई घायल हुए और कई मकान जमींदोज हो गए, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों की जुबान पर सिर्फ जांच होगी का रटा-रटाया बयान है।लोकल इंटेलिजेंस यूनिट (LIU) की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। जब गांव में 15-20 घरों में पटाखे बनाने का कारोबार चल रहा था, तो पुलिस और खुफिया इकाई अंधी-बहरी क्यों बनी रही? या फिर सबकी मिलीभगत से यह कारोबार फल-फूल रहा था?

हादसों के बाद जागना, पुलिस का पुराना ढर्रा,चौकी इंचार्ज निलंबित

यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले पांच साल में बेहटा गांव में पटाखों के विस्फोट से चार हादसे हो चुके हैं। कई जाने गईं, दर्जनों घायल हुए। लेकिन हर बार जिम्मेदार सिर्फ सस्पेंशन और जांच का खेल खेलते हैं। इस बार भी डीसीपी पूर्वी शशांक सिंह ने चौकी इंचार्ज और बीट सिपाही को निलंबित कर दिया। सवाल ये है कि क्या सिर्फ दो पुलिसकर्मियों की गलती थी? क्या अफसरों को कोई जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए?

लाइसेंस की आड़ में मौत का कारोबार

डीसीपी ने सफाई दी कि आलम की भाभी खातूना के नाम पर पटाखे बनाने का लाइसेंस था। मगर सवाल यह है कि रिहायशी इलाके में पटाखे बनाने और जमा करने का लाइसेंस आखिर कैसे दिया गया? और अगर लाइसेंस खातूना के नाम पर था, तो धमाका आलम के घर में क्यों हुआ? अग्निशमन अधिकारी अंकुश मित्तल साफ कह चुके हैं कि आलम के घर में अवैध रूप से पटाखे बनाए जा रहे थे। यानी, पुलिस के दावों और हकीकत में जमीन-आसमान का फर्क है।

धमाके के बाद की अफरा-तफरी

शाम को शेरू के गोदाम में हुए धमाके की आवाज कई किलोमीटर दूर तक सुनाई दी। पूरा इलाका दहल गया। लोग घरों से बाहर निकल आए। गोदाम मलबे में तब्दील हो गया। विस्फोट की चपेट में आकर एक गाय की मौत हो गई और एक भैंस घायल हो गई। दमकल की गाड़ियां पहुंचीं और घंटों मशक्कत के बाद आग को काबू किया गया।

ग्रामीणों का दर्द ,शिकायत की, लेकिन पुलिस ने नहीं सुनी

गांव के इदरीश और अन्य ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार पटाखों के इस अवैध कारोबार की शिकायत पुलिस से की, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। एक ग्रामीण ने बताया कि विरोध करने पर पटाखा बनाने वाले दबंगई पर उतर आते हैं। नतीजा यह कि गांव के लोग सालों से मौत के साए में जी रहे हैं।

राजधानी के लिए बड़ा खतरा

लखनऊ में यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले दो दशकों में चिनहट, काकोरी, मोहनलालगंज, बंथरा, आशियाना, गोसाईंगंज और पारा समेत कई इलाकों में पटाखा फैक्ट्री या गोदाम फटने से बड़ी संख्या में मौतें हो चुकी हैं। हर बार जांच हुई, लेकिन नतीजा वही कुछ दिनों बाद सब ठंडे बस्ते में। बेहटा का धमाका सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि पुलिस-प्रशासन की नाकामी और सुस्त रवैये की पोल खोलने वाली त्रासदी है। अगर इस बार भी सिर्फ जांच और सस्पेंशन की खानापूर्ति हुई, तो आने वाले दिनों में राजधानी फिर किसी बड़े धमाके का गवाह बनेगी।

असल सवाल

पुलिस और खुफिया विभाग को भनक क्यों नहीं लगी?

रिहायशी इलाके में पटाखा बनाने का लाइसेंस किस आधार पर दिया गया?

बार-बार हादसों के बावजूद ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

क्या सिर्फ बीट सिपाही और चौकी इंचार्ज पर कार्रवाई करके अफसर अपनी जिम्मेदारी से बच जाएंगे?

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